“मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखा जाए—शरीयत हमारी धार्मिक पहचान है, इसमें बदलाव किसी भी हाल में मंज़ूर नहीं!”
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी की दोटूक मांग—धार्मिक आज़ादी, संवैधानिक अधिकारों और मुस्लिम समाज की धार्मिक पहचान का हो सम्मान
प्रेस विज्ञप्ति | अम्बिकापुर, जिला सरगुजा, छत्तीसगढ़
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी ने प्रस्तावित समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर मुस्लिम समाज की धार्मिक स्वतंत्रता, शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों और संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण का सवाल प्रमुखता से उठाया है। सोसाइटी के अध्यक्ष मोहम्मद इस्लाम एवं सचिव रशीद अहमद ने स्पष्ट मांग की है कि मुस्लिम समाज को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि समाज अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं के अनुरूप अपने व्यक्तिगत कानूनों का पालन कर सके।
उन्होंने कहा कि यदि UCC में अनुसूचित जनजातियों को उनकी विशिष्ट सामाजिक, सांस्कृतिक और पारंपरिक पहचान के मद्देनज़र बाहर रखने का प्रावधान किया जाता है, तो मुस्लिम समाज के धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के संदर्भ में भी इसी तरह के विकल्प पर विचार किया जाना चाहिए।
उनका कहना है कि भारत की पहचान उसकी धार्मिक विविधता, सांस्कृतिक विरासत और अनेकता में एकता से है। कानून निर्माण की प्रक्रिया में सभी समुदायों की मान्यताओं, भावनाओं और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
शरीयत हमारी धार्मिक पहचान है—इसमें बदलाव किसी भी हाल में मंज़ूर नहीं!
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी के अध्यक्ष मोहम्मद इस्लाम एवं सचिव रशीद अहमद ने दोटूक शब्दों में कहा कि मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखा जाना चाहिए। हमें अपने शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों से कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि शरीयत हमारी धार्मिक आस्था, पहचान और जीवन-पद्धति का अभिन्न हिस्सा है।
हमारी मांग स्पष्ट है—जब हम अपने धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों का पालन करना चाहते हैं, तो हम पर ऐसे बदलाव क्यों थोपे जाएं, जिनसे हमारी धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े अधिकार प्रभावित हो सकते हैं?
उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज अपनी धार्मिक पहचान और शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों को लेकर गंभीर है। समाज की धार्मिक भावनाओं और सहमति की अनदेखी करके कोई ऐसा बदलाव स्वीकार्य नहीं होगा, जो उसकी धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले।
हम शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों में अपनी धार्मिक आस्था के विरुद्ध किसी भी बदलाव को बर्दाश्त नहीं करेंगे। हमारी मांग किसी दूसरे समुदाय के अधिकारों के विरुद्ध नहीं, बल्कि अपने धार्मिक अधिकारों और पहचान के संरक्षण के लिए है।
हमारा मानना है कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कानून से प्रभावित होने वाले समुदायों की बात सुनी जानी चाहिए। मुस्लिम समाज की आशंकाओं को नज़रअंदाज़ करने के बजाय सरकार को उसके प्रतिनिधियों, धर्मगुरुओं, महिलाओं, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों के साथ गंभीर संवाद करना चाहिए।
संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता देता है—हम धर्म और संविधान दोनों का सम्मान करते हैं
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है। यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, सदाचार, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। वहीं, अनुच्छेद 44 राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास करने का निर्देश देता है।
इसलिए UCC के विषय पर धार्मिक स्वतंत्रता, समानता, महिला अधिकारों और संवैधानिक प्रावधानों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए गंभीर विमर्श आवश्यक है।
सोसाइटी ने कहा कि हम संविधान का सम्मान करते हैं और अपनी धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने के अधिकार का भी संरक्षण चाहते हैं। धर्म और संविधान को एक-दूसरे का विरोधी बताना उचित नहीं है।
भारत का संविधान सभी नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता को मान्यता देता है। हालांकि, व्यक्तिगत कानूनों पर इन अधिकारों का प्रभाव और उनकी कानूनी सीमाएं संबंधित संवैधानिक प्रावधानों तथा लागू कानूनों के अनुसार निर्धारित होती हैं। इसलिए UCC से जुड़े किसी भी निर्णय में संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर व्यापक विचार-विमर्श किया जाना चाहिए।
हम सरकार से आग्रह करते हैं कि मुस्लिम समाज की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए और ऐसा समाधान तलाशा जाए, जो धार्मिक स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों तथा सामाजिक सद्भाव का सम्मान करे।
शरीयत, इंसानियत और वतन से मोहब्बत—एक-दूसरे के विरोधी नहीं
अध्यक्ष मोहम्मद इस्लाम एवं सचिव रशीद अहमद ने कहा कि भारतीय मुसलमान इस देश की सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। हमारी धार्मिक आस्था और देश के संविधान के प्रति सम्मान को एक-दूसरे के विपरीत प्रस्तुत करना उचित नहीं है।
इस्लाम इंसाफ़, अमन, ईमानदारी, रहमदिली, भाईचारे और इंसानियत की शिक्षा देता है। भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब और अनेकता में एकता की परंपरा को मज़बूत करना हम सभी की साझा ज़िम्मेदारी है।
हमारी धार्मिक पहचान हमें अपने वतन से दूर नहीं करती; हमारा संविधान हमें एक समान नागरिक के रूप में जोड़ता है।
हम चाहते हैं कि भारत का प्रत्येक नागरिक अपनी धार्मिक मान्यताओं का सम्मान करते हुए देश की एकता, अखंडता और संवैधानिक व्यवस्था के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी निभाए। धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा साथ-साथ चल सकती हैं।
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी की प्रमुख मांगें
1. मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखने पर विचार किया जाए। यदि अनुसूचित जनजातियों के लिए UCC से बाहर रखने का प्रावधान किया जाता है, तो मुस्लिम समाज को भी उसके धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के संदर्भ में बाहर रखने के विकल्प पर गंभीरता से विचार किया जाए।
2. शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए। मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े अधिकारों के संवैधानिक एवं कानूनी पहलुओं पर गंभीरता से विचार हो।
3. प्रस्तावित UCC का मसौदा सार्वजनिक किया जाए। नागरिकों और सामाजिक संगठनों को इसके प्रावधानों तथा संभावित प्रभावों को समझने और अपनी राय रखने का अवसर दिया जाए।
4. मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों से व्यापक संवाद हो। धर्मगुरुओं, महिलाओं, विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और सामाजिक संगठनों को चर्चा में शामिल किया जाए।
5. धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और महिला सम्मान के बीच संतुलन स्थापित किया जाए। सभी प्रभावित समुदायों की बात सुनकर संवैधानिक और न्यायपूर्ण समाधान तलाशा जाए।
6. किसी भी समुदाय की धार्मिक मान्यताओं की अनदेखी न हो। धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों से जुड़े विषयों पर पर्याप्त विमर्श और संवैधानिक समीक्षा के बिना एकतरफा निर्णय लेने से बचा जाए।
हमारा स्पष्ट संदेश—संवाद भी चाहिए, सम्मान भी और धार्मिक स्वतंत्रता भी!
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी स्पष्ट करना चाहती है कि हमारी मांग किसी अन्य धर्म या समुदाय के अधिकारों के विरुद्ध नहीं है। हम चाहते हैं कि हर धर्म, हर समाज और हर नागरिक को समान सम्मान मिले। जिस प्रकार देश की विविधता और विशिष्ट परंपराओं का सम्मान आवश्यक है, उसी प्रकार मुस्लिम समाज की धार्मिक मान्यताओं और व्यक्तिगत कानूनों से जुड़ी चिंताओं पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
हम समानता, इंसाफ़ और महिला सम्मान के महत्व को समझते हैं। हमारा आग्रह है कि इन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़ी चिंताओं की अनदेखी न की जाए और सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर मिले।
हमारी मांग किसी से विशेषाधिकार छीनने की नहीं, बल्कि अपने धार्मिक अधिकारों और पहचान के संरक्षण की है।
हम लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से अपनी आवाज़ उठाते रहेंगे। सरकार को चाहिए कि मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करे और शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों तथा धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े सभी पहलुओं पर व्यापक संवाद सुनिश्चित करे।
हमारी अंतिम और दोटूक बात
शरीयत हमारी धार्मिक पहचान है। संविधान हमारा गौरव है। धार्मिक स्वतंत्रता हमारा अधिकार है।
मुस्लिम समाज को UCC से बाहर रखने पर गंभीरता से विचार किया जाए। हमारी धार्मिक मान्यताओं और शरीयत आधारित व्यक्तिगत कानूनों में हमारी आस्था एवं अधिकारों की अनदेखी करके कोई बदलाव स्वीकार्य नहीं होगा।
हम चाहते हैं कि भारत की गंगा-जमुनी तहज़ीब, धार्मिक विविधता और अनेकता में एकता की परंपरा और मज़बूत हो। संविधान की गरिमा बनी रहे, हर धर्म का सम्मान हो और प्रत्येक नागरिक को अपनी धार्मिक आस्था के अनुरूप जीवन जीने का अवसर मिले।
शरीयत की हिफ़ाज़त हो, संविधान का एहतराम बना रहे और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान हो—यही रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी की मांग और हमारी स्पष्ट आवाज़ है।
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जारीकर्ता:
मोहम्मद इस्लाम
अध्यक्ष
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी, अम्बिकापुर
रशीद अहमद
सचिव
रहनुमा एजुकेशनल सोसाइटी, अम्बिकापुर


