अग्रवाल समाज के महाकुंभ जैसे बड़े सामाजिक आयोजन की प्रेसवार्ता या लिफाफा वितरण?
अग्रवाल समाज के महाकुंभ जैसे बड़े सामाजिक आयोजन की प्रेसवार्ता में पत्रकारों को सम्मान और निष्पक्ष संवाद की उम्मीद थी। लेकिन यदि प्रेसवार्ता के दौरान पत्रकारों को ₹500 के लिफाफे बांटे गए हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या पत्रकारों की भूमिका अब खबरों से ज्यादा लिफाफों की कीमत तय करने तक सीमित कर दी गई है?
पत्रकार समाज का आईना होता है, उसकी कलम की कीमत किसी लिफाफे में तय नहीं होनी चाहिए।
₹500 देकर खबर खरीदी जा सकती है या सिर्फ चुप्पी?
आयोजन बड़ा हो सकता है, समाज प्रतिष्ठित हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की गरिमा उससे भी बड़ी है। अगर यह बात सही है कि प्रेसवार्ता में लिफाफे बांटे गए, तो आयोजकों को यह स्पष्ट करना चाहिए कि ₹500 किस उद्देश्य से दिए गए—सम्मान के नाम पर, आने-जाने के खर्च के लिए या खबर के बदले?
पत्रकार की कीमत ₹500 नहीं, उसकी निष्पक्ष कलम है।



