आदिवासियों के रगो में बहता खून नहीं पानी हैं।
फिजूल में युवाओं का,
मर रहा जवानी हैं।।
पुरखों के धरोहर सब मिट रहे हैं,
अब कहां ? पुरानी कहानी हैं।
जल, जंगल, जमीन क़ो,
देखों लूट रहा आदानी हैं।।
मिलेंगे अब उजड़े जंगल,
और
खेत, कुआ, नदी, तालाब में सूखा पानी।
बीमार होगा आदिवासी,
गाँव में फैक्ट्री के धुआँ, खदान के धूल, रोज करेंगे मनमानी।।
फिर भी तानाशाह का बढ़ रहा बेईमानी हैं,
बल्कि आदिवासी कई वर्षो से झेल रहे सब हानि हैं।
आदिवासी समाज की मिट रहा अस्तित्व हैं,
फिर भी आदिवासियों की ये कैसी नदानी हैं ??
आदिवासियों के रगो में बहता,
खून नहीं पानी हैं।
फिजूल में युवाओं का मर रहा जवानी हैं ।।
सामाजिक कार्यकर्ता
जयमान एक्का
मो. न. 6264214760



