सत्य की राह कठिन जरूर होती है, लेकिन अंततः जीत सत्य की ही होती है।
पिछले पांच वर्षों से मैं जिस फर्नीचर घोटाले (सर्व शिक्षा अभियान अंबिकापुर) 2010-11 के मामले को लेकर लगातार संघर्ष कर रहा था, आज 15 साल के बाद उसमें हुई बड़ी कार्रवाई से मन को सुकून मिला है। यह केवल एक मामले में कार्रवाई होने की बात नहीं है, बल्कि उस लंबे संघर्ष, धैर्य और न्याय की उम्मीद की भी कहानी है, जिसे लेकर मैंने वर्षों तक अपनी लड़ाई जारी रखी।
इस मामले में मैंने आरटीआई के माध्यम से जानकारी जुटाई। दस्तावेजों का अध्ययन किया और तथ्यों के आधार पर पहली बार शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद यह लड़ाई आसान नहीं रही। कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा। मुझे हतोत्साहित करने और दबाव बनाने के प्रयास भी किए गए। कई बार ऐसा लगा कि इस मामले को आगे बढ़ाने में जानबूझकर देरी की जा रही है, लेकिन मैंने पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
मैंने हार मानने के बजाय हर स्तर पर शिकायत की। संबंधित अधिकारियों और जिम्मेदार संस्थाओं तक अपनी बात पहुंचाई। जब मुझे लगा कि मामले में न्याय पाने के लिए कानूनी रास्ता अपनाना जरूरी है, तब मैंने न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया और न्यायालय में परिवाद दाखिल किया। मेरा उद्देश्य शुरू से ही स्पष्ट था कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, तथ्यों को सामने लाया जाए और यदि किसी ने गड़बड़ी की है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई हो।
पांच साल का यह सफर आसान नहीं था। समय बीतता गया, परिस्थितियां बदलती रहीं और न्याय मिलने का इंतजार लंबा होता गया। लेकिन मेरे मन में एक विश्वास हमेशा कायम रहा कि सच को कितने भी दबावों के बीच दबाने का प्रयास किया जाए, वह हमेशा के लिए छिपा नहीं रह सकता। न्याय मिलने में देर हो सकती है, लेकिन न्याय की उम्मीद कभी नहीं छोड़नी चाहिए।
आज जब फर्नीचर घोटाले के आरोपियों के विरुद्ध बड़ी कार्रवाई की खबर सामने आई है, तो मुझे संतोष है कि जिस मामले को लेकर मैंने लगातार आवाज उठाई, वह आखिरकार कार्रवाई के महत्वपूर्ण पड़ाव तक पहुंचा है। यह उन सभी लोगों के लिए भी एक संदेश है, जो अन्याय या भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाना चाहते हैं, लेकिन दबाव, धमकी या लंबी प्रक्रिया के कारण पीछे हट जाते हैं।
मेरे लिए यह व्यक्तिगत जीत से कहीं अधिक, सत्य और जवाबदेही में विश्वास की जीत है।
मैंने अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इस मामले को उठाया और लगातार प्रयास किया। मेरा मानना है कि सार्वजनिक धन और जनहित से जुड़े मामलों में पारदर्शिता होनी चाहिए तथा किसी भी अनियमितता की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
आज मन में संतोष है, लेकिन यह भी जरूरी है कि मामले की आगे की कानूनी प्रक्रिया निष्पक्षता से पूरी हो और तथ्यों के आधार पर दोषियों की जिम्मेदारी तय हो।पांच साल की इस लड़ाई ने मुझे एक बार फिर यह सिखाया है कि संघर्ष लंबा हो सकता है, रास्ते में बाधाएं आ सकती हैं और दबाव भी झेलना पड़ सकता है, लेकिन यदि उद्देश्य जनहित में हो और प्रयास तथ्यों के आधार पर किए जाएं, तो हौसला नहीं खोना चाहिए।सत्य कभी पराजित नहीं होता। न्याय की राह में देर हो सकती है, लेकिन उम्मीद और संघर्ष ही हमें मंजिल तक पहुंचाते हैं।
आज मुझे सुकून है कि मेरी वर्षों की मेहनत और लगातार उठाई गई आवाज के बीच इस मामले में बड़ी कार्रवाई हुई है। यह लड़ाई मैंने शुरू की थी, उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए आगे भी तथ्यों, कानून और न्याय के रास्ते पर अपनी आवाज बुलंद रखूंगा।
परवेज़ आलम गांधी
कांग्रेस नेता
अम्बिकापुर



