प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने हाल ही में एक रील के माध्यम से उन्हें मिली गालियों का ज़िक्र किया। निस्संदेह, किसी भी व्यक्ति के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग उचित नहीं है। लोकतंत्र में असहमति हो सकती है, विरोध हो सकता है, लेकिन गाली-गलौज किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।
लेकिन इस पूरे विषय का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। क्या सत्ता को यह नहीं सोचना चाहिए कि आख़िर देश का एक बड़ा वर्ग, विशेषकर छात्र और युवा, नाराज़ क्यों हैं? यदि देश का नौजवान सड़कों पर उतरकर सवाल पूछ रहा है, तो केवल उसके शब्दों पर प्रतिक्रिया देने के बजाय उसकी पीड़ा और चिंताओं को भी समझना चाहिए।
लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने के लिए नहीं होती, बल्कि सवाल पूछने का भी अधिकार रखती है। सवालों का जवाब संवाद से दिया जाना चाहिए, नाराज़गी के कारणों पर विचार किया जाना चाहिए।
साथ ही, यह भी सच है कि सार्वजनिक जीवन में भाषा की मर्यादा का पालन सभी को करना चाहिए। यदि संसद, चुनावी सभाओं या राजनीतिक मंचों से कटु, अपमानजनक या असंसदीय शब्द सुनाई देंगे, तो समाज पर उसका प्रभाव भी पड़ेगा। मर्यादा का आग्रह केवल जनता से नहीं, बल्कि नेताओं से भी समान रूप से होना चाहिए।
देश के महापुरुषों, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान राजनीति से ऊपर होना चाहिए। किसी भी दल या विचारधारा को ऐसी भाषा से बचना चाहिए जो हमारे राष्ट्रीय आदर्शों के सम्मान को ठेस पहुँचाए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सत्ता और विपक्ष दोनों आत्ममंथन करें। जनता भी अपनी भाषा संयमित रखे और सत्ता भी जनता की आवाज़ को गंभीरता से सुने। लोकतंत्र की खूबसूरती आलोचना को दबाने में नहीं, बल्कि उसे सुनकर स्वयं को बेहतर बनाने में है।
जब जनता सवाल पूछती है, तो उसे दुश्मन नहीं समझना चाहिए। और जब जनता मर्यादा की अपेक्षा करती है, तो सत्ता को सबसे पहले स्वयं उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली ताक़त है।
— रशीद अहमद अंसारी
अध्यक्ष, जिला कांग्रेस कमेटी अल्पसंख्यक विभाग, सरगुजा (अंबिकापुर)



