3000–5000 रुपये में 10–15 वर्षों से सेवा देने को मजबूर कर्मचारी, आदेश के पालन में बीएमओ की लापरवाही पर उठे सवाल; आंदोलन की चेतावनी,,,,
संवाददाता: सौरभ साहू कि खास रिपोर्ट,,,
दिनांक 04/07/2026,
लोकेशन, सूरजपुर छत्तीसगढ़,,।।
सूरजपुर। जिले के स्वास्थ्य विभाग में अधिकारियों के आदेशों की अनदेखी का गंभीर मामला सामने आया है। मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमएचओ) द्वारा जारी स्पष्ट निर्देश के बावजूद तीन महीने से अधिक समय बीत जाने पर भी जीवन दीप समिति (JDS) के कर्मचारियों को कलेक्टर दर पर वेतन का लाभ नहीं मिल पाया है। इससे स्वास्थ्य कर्मचारियों में भारी नाराजगी व्याप्त है और विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जानकारी के अनुसार, छत्तीसगढ़ प्रदेश स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के जीवन दीप प्रकोष्ठ द्वारा वेतन विसंगति को लेकर ज्ञापन सौंपे जाने के बाद सीएमएचओ ने 19 मार्च 2026 को जिले के सभी खंड चिकित्सा अधिकारियों (बीएमओ) को आदेश जारी कर जीवन दीप समिति के अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों को तत्काल कलेक्टर दर पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करने तथा पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए थे। लेकिन हैरानी की बात यह है कि तीन महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी अधिकांश कर्मचारियों को आज तक आदेश का लाभ नहीं मिल सका है।
वर्तमान में जिले के विभिन्न शासकीय अस्पतालों में कार्यरत जीवन दीप समिति के कर्मचारियों को मात्र 3000 से 5000 रुपये प्रतिमाह वेतन देकर काम कराया जा रहा है। इनमें कई कर्मचारी ऐसे हैं जो पिछले 10 से 15 वर्षों से लगातार स्वास्थ्य सेवाओं में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। महंगाई के इस दौर में इतनी कम राशि में परिवार का पालन-पोषण करना कर्मचारियों के लिए बेहद कठिन हो गया है।
जीवन दीप कर्मचारी संघ के जिलाध्यक्ष डॉ. निलेश कुमार साहू ने बताया कि यह पहला अवसर नहीं है जब इस संबंध में आदेश जारी हुआ हो। इससे पहले भी संचालनालय एवं सीएमएचओ स्तर से निर्देश जारी किए जा चुके हैं, लेकिन खंड चिकित्सा अधिकारियों द्वारा लगातार आदेशों की अनदेखी की जा रही है। उनका आरोप है कि कर्मचारी महीनों से कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें केवल आश्वासन देकर टाल दिया जाता है।
संघ ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र ही कलेक्टर दर पर वेतन भुगतान शुरू नहीं किया गया तो कर्मचारी उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होंगे। ऐसी स्थिति में स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित होने की पूरी संभावना है, जिसकी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की होगी।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब स्वयं जिले के सर्वोच्च स्वास्थ्य अधिकारी का आदेश लागू नहीं हो पा रहा है, तो आखिर उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी? यदि आदेशों का पालन ही नहीं होना है, तो उन्हें जारी करने का औचित्य क्या रह जाता है? अब देखना होगा कि जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस गंभीर मामले में संज्ञान लेकर जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करते हैं या फिर कर्मचारी इसी तरह अपने अधिकारों के लिए भटकते रहेंगे।



