सरगुजा, अंबिकापुर
28 दिसंबर 1885 को क़ायम हुई भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस सिर्फ़ एक सियासी पार्टी नहीं, बल्कि हिंदुस्तान की आज़ादी, संविधान और जम्हूरियत की सबसे मज़बूत आवाज़ रही है। कांग्रेस की 140 साल की तारीख़ इस बात की गवाह है कि यह तंज़ीम सत्ता के लिए नहीं, बल्कि इंसाफ़, बराबरी और अवाम के हक़ के लिए बनी थी।
कांग्रेस को इस मक़सद से क़ायम किया गया था कि ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठे, कमज़ोर को ताक़त मिले और हिंदुस्तान का हर नागरिक—चाहे वह किसी भी मज़हब, जाति या तबक़े से हो—बराबरी से जी सके। आज़ादी की जद्दोजहद से लेकर संविधान निर्माण तक, हर अहम मोड़ पर कांग्रेस ने क़ुर्बानी दी, समझौता नहीं किया।
कांग्रेस की यह ख़ास पहचान रही है कि इसकी क़यादत हमेशा गंगा-जमुनी तहज़ीब, सेकुलरिज़्म और राष्ट्रीय एकता की प्रतीक रही। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा का संदेश दिया, पंडित जवाहरलाल नेहरू ने आधुनिक और वैज्ञानिक भारत की नींव रखी, सरदार वल्लभभाई पटेल ने देश को एकता के सूत्र में पिरोया, इंदिरा गांधी ने साहस और आत्मनिर्भरता का रास्ता दिखाया और राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी की सोच से जोड़ा।
कांग्रेस के इतिहास में मुस्लिम अध्यक्षों की भूमिका भी बेहद अहम और गौरवपूर्ण रही है।
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने कांग्रेस की अध्यक्षता करते हुए साफ़ संदेश दिया कि हिंदुस्तान की ताक़त उसकी तादाद में नहीं, बल्कि उसकी विविधता में है। उन्होंने मुसलमानों से कहा कि वे मज़हब के नाम पर डरें नहीं, बल्कि संविधान और राष्ट्रीय एकता पर भरोसा रखें।
इसी तरह डॉ. ज़ाकिर हुसैन, रफ़ी अहमद किदवई और अन्य मुस्लिम नेताओं ने कांग्रेस को यह दिशा दी कि यह पार्टी अल्पसंख्यकों की नहीं, बल्कि हर मज़हब के नागरिकों की साझी विरासत है। उनका स्पष्ट संदेश था—
कांग्रेस में मज़हब की नहीं, इंसान की पहचान होती है।
आज का हिंदुस्तान एक बेहद नाज़ुक दौर से गुजर रहा है।
महंगाई आम आदमी की कमर तोड़ रही है,
बेरोज़गारी नौजवानों का मुस्तक़बिल छीन रही है,
और नफ़रत की सियासत समाज को बाँटने का ज़हर फैला रही है।
आज संविधान को कमज़ोर करने, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर दबाव बनाने और सच बोलने वालों को डराने की कोशिशें खुलकर सामने आ रही हैं। ऐसे माहौल में कांग्रेस की ज़िम्मेदारी कई गुना बढ़ जाती है। कांग्रेस को एक बार फिर वह मज़बूत दीवार बनना होगा, जिससे टकरा कर हर ज़ुल्म टूट जाए।
कांग्रेस साफ़ तौर पर कहती है—
हमें नफ़रत की सियासत मंज़ूर नहीं,
हमें मज़हब और जाति के नाम पर बँटवारा मंज़ूर नहीं,
हमें संविधान और जम्हूरियत से खिलवाड़ मंज़ूर नहीं।
कांग्रेस की सियासत अवाम के हक़, मज़लूम की आवाज़ और संविधान की हिफ़ाज़त की सियासत है। यही कांग्रेस की पहचान रही है और यही आज की सबसे बड़ी ज़रूरत भी है।
आज कांग्रेस स्थापना दिवस के मौक़े पर यह अहद दोहराने का वक़्त है कि हम डरेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं और सच के रास्ते से पीछे नहीं हटेंगे। बूथ से लेकर सड़क तक, हर ज़ुल्म और हर नाइंसाफ़ी के ख़िलाफ़ मज़बूती से खड़े रहेंगे।
140 साल पहले जो मशाल जली थी,
आज उसे और तेज़, और ऊँचा जलाना होगा।
क्योंकि अगर संविधान बचेगा,
तो जम्हूरियत बचेगी—
और जम्हूरियत की हिफ़ाज़त का नाम ही कांग्रेस है।
कांग्रेस ज़िंदाबाद
इंक़लाब ज़िंदाबाद
जय हिंद।



