बंगाल यूसीसी लाने की तैयारी में है। इस बड़े सियासी दांव के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक माननीय इंद्रेश कुमार जी मुस्लिम समाज को ‘डरो मत, जुड़ो’ का भरोसा दे रहे हैं। उनका कहना है कि समान नागरिक संहिता ‘मजहब अपना-अपना, देश सबसे पहले’ के सिद्धांत को जमीन पर उतारेगी। माननीय इंद्रेश कुमार मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के जरिए दो दशक से एक ही बात दोहराते हैं।“भारतीय मुसलमानों का DNA बाकी भारतीयों जैसा ही है। इस्लाम बाहर से नहीं आया, यहीं के लोगों ने अपनाया”। इसलिए वे अल्पसंख्यक शब्द को ही खारिज करते हैं। उनकी लाइन साफ है।“राष्ट्र की पूजा सबसे बड़ी इबादत है और भारत माता की जय से मजहब नहीं बदलता।” यूसीसी पर वे इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, “आप किराएदार नहीं, इस देश के वारिस हो।” उनका आरोप है कि वोटबैंक की सियासत ने मुसलमानों को डराकर मुख्यधारा से अलग रखा। नतीजा सच्चर कमेटी में दिखा: उच्च शिक्षा में चार दशमलव छह प्रतिशत नामांकन, सरकारी नौकरी में तीन प्रतिशत से भी कम हिस्सेदारी। वे तीन तलाक कानून को मिसाल बताते हैं। “जैसे उससे बहनों को हक मिला, यूसीसी से विरासत-गोद लेने में बराबरी मिलेगी। जब कानून एक होगा, भरोसा अपने आप बनेगा।” बंगाल में बीजेपी ने साफ किया कि यूसीसी आदिवासियों पर लागू नहीं होगा। सत्ताईस प्रतिशत मुस्लिम आबादी और निर्णायक ST वोट के बीच यह बैलेंसिंग एक्ट है। माननीय इंद्रेश कुमार की ‘वारिस’वाली अपील भावनाओं को छूती है, लेकिन यूसीसी का विरोध शरीयत में दखल की आशंका से जुड़ा है। इसलिए सरकार को समुदाय के धर्मगुरुओं, बुद्धिजीवियों और आम लोगों से खुलकर बात करनी होगी। ड्राफ्ट बिल आने से पहले यह साफ करना जरूरी है कि कौन से नियम बदलेंगे और कौन से नहीं। तीन तलाक कानून के समय भी पहले संवाद हुआ, फिर कानून बना। वही तरीका यहां भी अपनाना पड़ेगा। सिर्फ यूसीसी बनाने से सच्चर कमेटी में सामने आए आंकड़े नहीं बदल जाएंगे। चार दशमलव छह प्रतिशत उच्च शिक्षा और तीन प्रतिशत सरकारी नौकरी की खाई पाटने के लिए समान नागरिक संहिता के साथ-साथ कौशल विकास, स्कॉलरशिप और रोजगार पर भी ठोस काम करना होगा। माननीय इंद्रेश कुमार जी खुद मानते हैं कि तुष्टीकरण से नुकसान हुआ, अब सशक्तिकरण से ही बात बनेगी। अगर यूसीसी के साथ मुस्लिम बहुल इलाकों में विशेष शिक्षा अभियान चलाया जाए, तो ‘मुख्यधारा से जुड़ने’का दावा हकीकत बन सकता है। गोवा में यूसीसी 1961 से लागू है। वहां शादी-तलाक का रजिस्ट्रेशन होता है और बेटी-बेटे को विरासत में बराबर हक मिलता है। कोई बड़ा विरोध सामने नहीं आया। उत्तराखंड ने 2024 में यूसीसी लागू करते समय लिव-इन रजिस्ट्रेशन जैसे नए प्रावधान भी प्रस्तावित किए। बंगाल इन राज्यों के अनुभव से सीख लेकर बता सकता है कि यूसीसी से किसी की धार्मिक पहचान खत्म नहीं होती। डर की जगह तथ्यों से बात करना ही रास्ता है। यूसीसी पर सियासत भी तेज होगी। विपक्ष इसे ध्रुवीकरण का मुद्दा बनाएगा, तो बीजेपी इसे एक देश, एक विधान के वादे से जोड़ेगी। लेकिन असली लड़ाई नैरेटिव की है। ‘राष्ट्र प्रथम’ के साथ ‘सबका विकास’का पूरा खाका पेश करते हैं, तो बहस हिंदू बनाम मुस्लिम की जगह पिछड़ापन बनाम प्रगति में बदल सकती है। ‘डर छोड़ो, दस्तूर बदलो’ माननीय इंद्रेश कुमार जी का संदेश स्पष्ट है। लेकिन यह संदेश मिशन तभी बनेगा जब कानून के साथ संवाद, शिक्षा और विश्वास तीनों आयामों पर एक साथ काम हो।
असरा अख्तर
मुस्लिम राष्ट्रीय मंच



