बंगाल चुनाव ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं था, बल्कि यह उस भरोसे की परीक्षा थी, जिस पर पूरी चुनावी व्यवस्था टिकी हुई है। आज देश के एक बड़े वर्ग के मन में यह शंका गहराती जा रही है कि क्या चुनाव वास्तव में पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी हैं, या फिर व्यवस्था पर किसी एक पक्ष का प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
सबसे बड़ा मुद्दा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर उठ रहा है। तकनीक का उद्देश्य प्रक्रिया को आसान और तेज़ बनाना होता है, लेकिन जब उसी तकनीक पर भरोसा कम होने लगे, तो यह लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय बन जाता है। कई लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जब तक EVM पर पूरी तरह से पारदर्शिता और विश्वास बहाल नहीं होता, तब तक चुनावी प्रक्रिया पर संदेह बना रहेगा।
इसी संदर्भ में बंगाल से जुड़ी एक और गंभीर चिंता सामने आई है—SIR के नाम पर लाखों वोट काटे जाने के आरोप। कहा जा रहा है कि लगभग 90 लाख वोट प्रभावित हुए और लाखों लोग, जो अपने पूरे दस्तावेज़ों के साथ न्याय के लिए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचे, उन्हें भी राहत नहीं मिल सकी। यदि ऐसा हुआ है, तो यह केवल एक प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों से लोगों को वंचित करने जैसा मामला बन जाता है। वोट देना हर नागरिक का मूल अधिकार है, और उससे वंचित होना लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा आघात है।
इन घटनाओं ने आम नागरिक के मन में गहरी चिंता पैदा कर दी है—देश कैसे चलेगा, संविधान का क्या होगा? जब एक ओर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर देश में गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याएं लगातार बढ़ती दिखाई दे रही हैं। पढ़े-लिखे युवा भी रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन उनके असली मुद्दों से ध्यान हटाकर उन्हें धार्मिक और सामाजिक विभाजनों में उलझाया जा रहा है।
यह स्थिति केवल वर्तमान की नहीं, बल्कि भविष्य की भी चिंता पैदा करती है। आने वाली पीढ़ियां किस तरह के भारत में जीएंगी? क्या वे नफरत और विभाजन के माहौल में पले-बढ़ेंगी, या फिर आपसी प्यार, भाईचारे और एकता के साथ एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण करेंगी? यह सवाल केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी है।
भारत की असली ताकत उसकी विविधता में एकता है। यहां हर धर्म, हर वर्ग, हर समुदाय के लोग मिलकर देश को आगे बढ़ाते हैं। खासकर अल्पसंख्यकों के लिए यह भावना बेहद जरूरी है कि वे अपने ही देश में सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। अगर किसी भी वर्ग के मन में डर या असुरक्षा पैदा होती है, तो यह पूरे समाज के लिए खतरे की घंटी है।
ऐसे समय में जरूरत है कि हम सब—पार्टी, दल, जात-पात और धर्म से ऊपर उठकर—एक सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ें। लोकतंत्र को मजबूत करने का रास्ता टकराव से नहीं, बल्कि संवाद, समझ और एकता से निकलता है। हमें नफरत की आग को नहीं, बल्कि प्यार की शम्मा को रौशन करना होगा।
इसी के साथ, अब यह मांग भी तेज़ होनी चाहिए कि आगे के चुनाव पूरी पारदर्शिता और विश्वास के साथ कराए जाएं। यदि जनता के एक बड़े वर्ग को EVM पर संदेह है, तो बैलेट पेपर के विकल्प पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। इस मुद्दे को लोकतांत्रिक तरीके से उठाने के लिए एक व्यापक जनआंदोलन की आवश्यकता है, जहां नागरिक शांतिपूर्ण और संवैधानिक दायरे में रहकर अपनी मांग रखें।
साथ ही, SIR के तहत जिन वास्तविक और पात्र मतदाताओं के नाम किसी भी कारण से हटाए गए हैं, उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और सही नामों को दोबारा जोड़ा जाना चाहिए। हर नागरिक को उसके मतदान के अधिकार से वंचित करना न केवल अन्याय है, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ भी है।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसा भारत बनाने का संकल्प लें, जहां हर नागरिक को उसका अधिकार मिले, हर आवाज सुनी जाए, और जहां इंसानियत, मोहब्बत और एकता ही सबसे बड़ी पहचान बने। तभी हमारा लोकतंत्र मजबूत होगा और देश वास्तव में आगे बढ़ेगा।
रशीद अहमद अंसारी
अध्यक्ष – जिला कांग्रेस कमेटी, अल्पसंख्यक विभाग
सरगुजा, अम्बिकापुर



