जनावतथे अबड़ सरगुजा कर जाड़ा। गोरसी ला बारा दाऊ कांपतथे हाड़ा। कवि संतोष सरल
1
ए जीव हर सांय सांय करतथे मितान।
जाड़ रोसाही त नई बांचे ककरो परान।
नाक कान ला ढांऐक लेईहा गोई हो,
चुरईहा आदी गोल मरीच कर काढ़ा।
जनावतथे अबड़ सरगुजा कर जाड़ा।
गोरसी ला बारा दाऊ कांपतथे हाड़ा।
2
भिनसरिहा उठे वला रज़ाई भीतरी अहंय।
सबेरे बुले वला आगी धरि बईठीन अहंय।
अंधेरिया निकले वला काबर तो ऐदे,
नई भेंटाएं दरूहा काका अऊ बाड़ा।
जनावतथे अबड़ सरगुजा कर जाड़ा।
गोरसी ला बारा दाऊ कांपतथे हाड़ा।
✍️कवि संतोष सरल,अंबिकापुर।



